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Wednesday, 4 April 2012

MERA YAR KAHE

हम कैसे इस बात को मानें कहने को संसार कहे,
मुझको ये मंज़ूर तभी होगा जब मेरा यार कहे।

मैं एक सिपाही हूं ख़ामोश पसंद ज़ुबां है मेरी,
दिल की बात मुकम्मल, सरहद पे मेरी तलवार कहे।

बेजान किनारों को जीत अकड़ न दिखाओ, है हिम्मत,
तो फिर मुझसे हाथ लड़ाओ सागर की मंझधार कहे।

मेरी हद तंग करो ना, भाई भाई के झगड़े में
रोते रोते हमसे गमगीं पुरखों की दीवार कहे।

सिर्फ़ ख़ुदा के आगे झुकता हूं , मुझसे उम्मीद न रख,
शाह से ,एक नक़ीब फ़कीर की गैरत-ए-दस्तार कहे।

इक घर में रह कर भी बरसों आपस में मिल ना पायें,
दौलत की दुनिया इनको ही आज सफ़ल परिवार कहे।

बिन्तों से ही कुनबा बढता है और न मारो इनको, ( बिन्तों - पुत्रियों)
हर उपदेश कहे ,हर तहज़ीब कहे, हर संस्कार कहे।

भूख अशिक्षा व गरीबी के दम ख़ूब बुलंद रहेंगे,
मजबूर वतन से ,ग्यानी ज़रदारों की सरकार कहे।

लूट खसोट जमाखोरी से कस्त्र खड़ा करके दानी,
हम बेईमानों के वंशज, इसको भी व्यापार कहें।

Thursday, 23 February 2012

नया हूं अभी

मैं तेरे शह्र में बिलकुल नया नया हूं अभी,
तेरे वादों के हवालात में बंधा हूं अभी।

चराग़ों के लिये मंज़ूर है मुझे मरना,
मुकद्दर आंधियों के तेग पर रखा हूं अभी।

घिरी है बदज़नी से , हुस्न की गली गोया,
लुटाने इश्क़ के इमान को चला हूं अभी।

बहुत डरता हूं उजालों की बेख़ुदी से मैं,
तेरी यादों के अंधेरों में जा छिपा हूं अभी।

ख़ुदा के गांव से आया हुआ मुसाफ़िर हूं,
तुम्हारे हुस्न के चौपाल पर फ़िदा हूं अभी।

मुहब्बत में वफ़ा के बदले धोखा ही पाया,
मगर फिर भी वफ़ा का ज़ुल्म कर रहा हूं अभी।

समंदर से मेरा रिश्ता पुराना है दानी,
सितमगर साहिलों से डरने लगा हूं अभी।

Thursday, 2 February 2012

क़ातिल लापता है

मौत से ये दिल रज़ा है,
और क़ातिल लापता है।

वो समंदर ,मैं किनारा,
उम्र भर का फ़ासला है।

मैं चरागों का मुहाफ़िज़,
वो हवाओं की ख़ुदा है।

सब्र की जंज़ीरें मुझको,
खुद हवस में मुब्तिला है।

सांसें कब की थम चुकी हैं,
ज़ख्मे दिल फिर भी हरा है।

बेवफ़ाई की ज़मीं पर,
शजरे दिल अब भी खड़ा है।

चैन भी वो ले गई है,
जिसको दिल मंने दिया है।

बोझ जीवन का उठाये,
इक ज़माना हो गया है।

प्यार की सरहद पे दानी,
इश्क़ ही क्यूं हारता है।

Thursday, 12 January 2012

वादों की कश्ती

वादों की कश्ती पर सवार है दिल,
हिज्र के ज़ुल्मों का शिकार है दिल्।

तुमसे मिल के करार पाऊंगा,
बस यही सोच बेकरार है दिल्।

तुमको देकर किनारों की खुशियां,
एक समंदर सा बेहिसार है दिल्।

तू थी तो बिन पिये नशा सा था,
तू गई जब से बेखुमार है दिल्।

तेरे खातिर बना के ताजमहल,
एक दरवेश का मज़ार है दिल्।

तू हवस के सफ़र की एक राही,
मंज़िले सब्र का ग़ुबार है दिल्।

तेरी ज़ुल्फ़ों के सर्द साये में,
एक भड़कता हुआ शरार है दिल्।

बेवफ़ाई की लह्रें भी मंज़ूर,
गो वफ़ा की तटों का यार है दिल्।

आज कल यूं ही दानी हंसता है,
वरना सदियों से अश्कबार है दिल

Saturday, 3 December 2011

झूठी मुहब्बत

हमारा घर भी जला दो जो रौशनी कम हो,
हमारी झूठी मुहब्बत की बानगी कम हो।

अगर ग़रीबों की करनी है सेवा, ये तभी हो
सकेगा जब ख़ुदा-ईश्वर की बंदगी कम हो।

पड़ोसी ,दोस्ती के बीज़ गर न रोपे तो,
हमारे खेतों से क्यूं फ़स्ले दुश्मनी कम हो।

मिले न राधा तो सलमा से ना ग़ुरेज़ करो,
कि बेवफ़ाओं की गलियों की चाकरी कम हो।

कभी संवारा करो ज़ुल्फ़ों को सरेबाज़ार,
तराजुओं के इरादों की गड़बड़ी कम हो।

उतार दूं तेरी आंखों के दरिया में कश्ती,
तेरी ज़फ़ाओं की गर धरती दलदली कम हो।

उंचे दरख़्तों से क्या फ़ायदा मुसाफ़िर को,
किसी के काम न आये वो ज़िन्दगी कम हो।

भले दो घंटे ही हर कर्मचारी काम करे,
मगर ये काम हक़ीक़ी हो काग़जी कम हो।

मिलेगी मन्ज़िलें कुछ देर से सही दानी,
हमेशा जीत की दिल में दरीन्दगी कम हो।

Monday, 7 November 2011

मेरे दर्द की दवा

तुम मेरे दर्द की दवा भी हो,
तुम मेरे ज़ख़्मों पर फ़िदा भी हो।

इश्क़ का रोग ठीक होता नहीं,
ये दिले नादां को पता भी हो।

शह्रों की बदज़नी भी हो हासिल,
गांवों की बेख़ुदी अता भी हो।

पेट परदेश में भरे तो ठीक,
मुल्क में कब्र पर खुदा भी हो।

महलों की खुश्बू से न हो परहेज़,
साथ फ़ुटपाथ की हवा भी हो।

उस समन्दर में डूबना चाहूं,
जो किनारों को चाहता भी हो।

मैं ग़रीबी की आन रख लूंगा,
पर अमीरों की बद्दुआ भी हो।

हारे उन लोगों से बनाऊं फ़ौज़,
जिनके सीनों में हौसला भी हो।

आशिक़ी का ग़ुनाह कर लूं साथ
दानी,मां बाप की दुआ भी हो।

Wednesday, 26 October 2011

आशिक़ी का पैमाना

आशिक़ी का कोई तो पैमाना होगा,
बेबसी के गीत कब तक गाना होगा।

चादनी की बदज़नी स्वीकार कर ले,
चंद को घर छोड़ या फिर जाना होगा।

सर झुका कर हुस्न के नखरे जो झेले,
दौरे-फ़रदा में वही मरदाना होगा।

दिल समंदर के नशा से निकले बाहर,
हुस्न की कश्ती में गर मैखाना होगा।

मैं ग़ुनाहे -इश्क़ कर तो लूं सनम,गर
दा्यरे- तफ़्तीश तेरा थाना होगा।

आये मुल्के हुस्न में आफ़त का तूफ़ां,
गर सिपाही इश्क़ का बेगाना होगा।

तेरी आंखों में शरारे जब दिखेंगी,
मरने को तैयार ये परवाना होगा।

फ़ंस चुका है जो हवस के जाल में ,वो
सब्र की शमशीर से अन्जाना होगा।

गर मदद की आग दानी लेनी है तो
तो गुज़रिश का धुआं फ़ैलाना होगा।