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Thursday, 12 January 2012

वादों की कश्ती

वादों की कश्ती पर सवार है दिल,
हिज्र के ज़ुल्मों का शिकार है दिल्।

तुमसे मिल के करार पाऊंगा,
बस यही सोच बेकरार है दिल्।

तुमको देकर किनारों की खुशियां,
एक समंदर सा बेहिसार है दिल्।

तू थी तो बिन पिये नशा सा था,
तू गई जब से बेखुमार है दिल्।

तेरे खातिर बना के ताजमहल,
एक दरवेश का मज़ार है दिल्।

तू हवस के सफ़र की एक राही,
मंज़िले सब्र का ग़ुबार है दिल्।

तेरी ज़ुल्फ़ों के सर्द साये में,
एक भड़कता हुआ शरार है दिल्।

बेवफ़ाई की लह्रें भी मंज़ूर,
गो वफ़ा की तटों का यार है दिल्।

आज कल यूं ही दानी हंसता है,
वरना सदियों से अश्कबार है दिल

2 comments:

  1. बेकरारी इस दिल की ........बहुत खूब

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