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Monday, 7 November 2011

मेरे दर्द की दवा

तुम मेरे दर्द की दवा भी हो,
तुम मेरे ज़ख़्मों पर फ़िदा भी हो।

इश्क़ का रोग ठीक होता नहीं,
ये दिले नादां को पता भी हो।

शह्रों की बदज़नी भी हो हासिल,
गांवों की बेख़ुदी अता भी हो।

पेट परदेश में भरे तो ठीक,
मुल्क में कब्र पर खुदा भी हो।

महलों की खुश्बू से न हो परहेज़,
साथ फ़ुटपाथ की हवा भी हो।

उस समन्दर में डूबना चाहूं,
जो किनारों को चाहता भी हो।

मैं ग़रीबी की आन रख लूंगा,
पर अमीरों की बद्दुआ भी हो।

हारे उन लोगों से बनाऊं फ़ौज़,
जिनके सीनों में हौसला भी हो।

आशिक़ी का ग़ुनाह कर लूं साथ
दानी,मां बाप की दुआ भी हो।

17 comments:

  1. उस समन्दर में डूबना चाहूं,
    जो किनारों को चाहता भी हो।
    वाह!

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  2. उस समन्दर में डूबना चाहूं,
    जो किनारों को चाहता भी हो।
    क्या बात है...
    उम्दा अशआर... खुबसूरत ग़ज़ल...
    सादर बधाई...

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  3. उस समन्दर में डूबना चाहूं,
    जो किनारों को चाहता भी हो।

    क्या बात है सर!
    बहुत ही खूबसूरत गजल है।

    सादर

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  4. मैं ग़रीबी की आन रख लूंगा,
    पर अमीरों की बद्दुआ भी हो।

    ....बहुत खूब! बहुत ख़ूबसूरत गज़ल...

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  5. अनुपका पाठक और संगीता स्वरूप ( गीत) जी को बहुत बहुत धन्यवाद्।

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  6. हबीब साहब और माथुर साहब को आभार।

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  7. महेन्द्र जी और कैलाश साहब को धन्यवाद्।

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  8. सुमन जी और अनु चौधरी जी का आभार।

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  9. रीना जी को धन्यवाद।

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  10. तुम मेरे दर्द की दवा भी हो,
    तुम मेरे ज़ख़्मों पर फ़िदा भी हो।

    खूबसूरत गज़ल.........!

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