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Saturday, 6 August 2011

विरह की आग

मुझसे सावन की घटा ,ये कह रही है,
क्यूं विरह की आग तेरे दर खड़ी है।

ऐसे मौसम में ख़फ़ा क्यूं तुझसे साजन ,
तेरे ही श्रृंगार में शायद कमी है।

कुछ अदा-ए-हुस्न का परचम तो फ़हरा,
तुझको यौवन की इनायत तो मिली है।

भीख मांगेगा रहम की,तुझसे वो, तू
हुस्न की जंज़ीर ढीली क्यूं रखी है।

बांध कर क्यूं रखते हो ज़ुल्फ़ों को अपनी,
इसके साये में हया भी बोलती है।

नथनी ,बिछिया , पैरों में माहुर कहां हैं,
सब्र की बुनियाद इनसे ही ढही है।

नीमकश नज़रों से बर्छी तो चलाओ,
सैकड़ों कुरबानी इसने ही तो ली है।

चूड़ियों को हौले से खनका तो दे , फिर
देखें कितनी पाक साजन की ख़ुदी है।

फिर सुना, झन्कार अपने पायलों की,
साधुओं की भी इन्हीं से दुश्मनी है।

सुर्ख साड़ी की ज़मानत क्यूं न लेती,
ये मुहब्बत की अदालत की सखी है।

तेरा साजन दौड़ कर आयेगा दानी,
वो कोई ईश्वर नहीं इक आदमी है।

4 comments:

  1. भीख मांगेगा रहम की,तुझसे वो, तू
    हुस्न की जंज़ीर ढीली क्यूं रखी है।

    बांध कर क्यूं रखते हो ज़ुल्फ़ों को अपनी,
    इसके साये में हया भी बोलती है।

    बहुत खूबसूरत गज़ल ...

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया संगीता स्वरूप गीत)जी।

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  3. फिर सुना,झन्कार अपने पायलों की
    साधुओं की भी इन्हीं से दुश्मनी है '
    ..........वाह क्या कहना संजय दानी साहब !
    उम्दा ग़ज़ल...बेहद रूमानी ..........हर शेर बेहतरीन

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